जहाँ एक ओर सरकार सांस्कृतिक आयोजनों के नाम पर करोड़ों रुपये बहाती है, वहीं दूसरी ओर दैवीय शक्तियों के संगम और इतिहास से जुड़े कर्णेश्वर को सिर्फ आश्वासन और उपेक्षा मिली है।
🛑 जमीन है… लेकिन सरकार की नीयत नहीं
हकीकत यह है कि—
मेला महोत्सव के लिए सरकारी जमीन आबंटित तो की गई,
लेकिन उस जमीन के समतलीकरण और विकास के लिए आज तक एक रुपया भी जारी नहीं किया गया।
नतीजा यह कि— ➡️ 500 साल पुराना ऐतिहासिक मेला
➡️ आज भी प्राइवेट जमीन मालिकों की जमीन पर मजबूरी में संचालित हो रहा है।
मड़ई से मेला महोत्सव तो कर दिया गया लेकिन हकीकत में न ढांचा बदला, न व्यवस्था।
आज भी—
शुद्ब पेयजल
पार्किंग नहीं
पहुंच मार्ग सकरी ओर बदहाल
🕉️ इतिहास जिसे नज़रअंदाज़ किया जा रहा
11वीं शताब्दी में सोमवंशी राजा कर्ण द्वारा निर्मित यह स्थल—
जीवनदायिनी महानदी का उद्गम
सप्त ऋषियों की तपोभूमि
सिहावा क्षेत्र की धार्मिक पहचान
फिर भी यह स्थान आज सरकार की प्राथमिकता सूची से बाहर है।
🏛️ जहाँ सरकार चाहती है, वहाँ करोड़ों
प्रदेश में—
राजिम कुंभ
सिरपुर महोत्सव
चक्रधर समारोह
इन आयोजनों पर सरकार दिल खोलकर खर्च करती है।
तो सवाल सीधा है—
❓ क्या कर्णेश्वर की आस्था सरकार के लिए दोयम दर्जे की है?
❓ या सिहावा क्षेत्र राजनीतिक नक्शे पर ही नहीं है?
⚠️ स्थानीय नेतृत्व की चुप्पी भी कटघरे में
सिर्फ सरकार ही नहीं,
स्थानीय जनप्रतिनिधियों की उदासीनता और इच्छाशक्ति की कमी ने भी कर्णेश्वर को पीछे धकेला है।
सिहावा का यह ऐतिहासिक आयोजन आज भी ट्रस्ट और आम जनता के भरोसे चल रहा है।
🤲 जनता और ट्रस्ट का सहयोग से संपन्न हो रहा मेला
हर साल—
मंदिर ट्रस्ट
आम ग्रामीण
श्रद्धालु
अपने पैसे, श्रम और आस्था से पांच दिन का आयोजन जैसे-तैसे पूरा करते हैं।
📢 अब साफ और कड़ी मांग
➡️ आवंटित भूमि का तत्काल समतलीकरण
➡️ स्थायी अधोसंरचना के लिए बजट स्वीकृति
➡️ कर्णेश्वर माघी पुन्नी मड़ई को राजकीय महोत्सव का दर्जा
❓ अंतिम और सबसे बड़ा सवाल
500 साल पुरानी परंपरा आज भी उधार की जमीन पर क्यों?
कर्णेश्वर को कब तक नजरअंदाज करती रहेगी सरकार?
👉 जब तक जवाब नहीं,
👉 तब तक यह सवाल सरकार और नेतृत्व दोनों का पीछा करता रहेगा।
मिश्रा जी की कलम से 🖊️.......

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