LIVE

6/recent/ticker-posts

कर्णेश्वर मेले में फिर ‘लूट’ का खेल? झूलों–क्राफ्ट बाज़ार पर किसका कंट्रोल, और सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा?



धमतरी - सिहावा स्थित कर्णेश्वर धाम देऊरपारा सिहावा में 1 फरवरी से शुरू होने जा रहा पांच दिवसीय कर्णेश्वर मेला महोत्सव 2026 एक बार फिर चर्चा में है। आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक पहचान के लिए मशहूर यह मेला हर साल हजारों लोगों को आकर्षित करता है। इस बार भी आकाश झूला, मौत का कुआं और क्राफ्ट बाज़ार मुख्य आकर्षण रहेंगे, लेकिन तैयारियों के साथ-साथ कई गंभीर सवाल भी खड़े हो रहे हैं।
4 लाख का टेंडर, फिर वही पुरानी चिंता
सूत्रों के मुताबिक, इस वर्ष झूले और मीना बाज़ार के संचालन के लिए लगभग 4 लाख रुपये में टेंडर दिया गया है आयोजन से जुड़े लोग तैयारियों में जुटे हैं, मगर क्षेत्रीय नागरिकों के मन में पिछली बार की अव्यवस्थाएं अब भी ताज़ा हैं।

पिछली बार क्या हुआ था?

पिछले मेले में मेला परिसर में प्रवेश फ्री था, लेकिन मीना बाज़ार और झूलों के लिए टिकट वसूली को लेकर विवाद खड़ा हो गया था। स्थानीय लोगों का आरोप था कि:
टिकट दरें 80–100 रुपये तक वसूली गईं

सुरक्षा इंतज़ाम नाकाफी थे

झुला वाले करतब दिखाने वालो को बीमा कवर की कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई प्रशासनिक अनुमति प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं दिखी कई छोटे-बड़े हादसों की खबरें भी सामने आईं, लेकिन कार्रवाई को लेकर स्पष्टता नहीं बन पाई।

क्राफ्ट बाज़ार बना असंतुलन की वजह?

स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि पिछले दो वर्षों से मेला स्थल पर लग रहे क्राफ्ट बाज़ार की वजह से पारंपरिक दुकानदारों का व्यवसाय प्रभावित हो रहा है आरोप है कि क्राफ्ट बाज़ार में भीड़ सिमटने से बाकी दुकानदार “मुंह ताकते” रह जाते हैं, जिससे पूरे मेले की आर्थिक गतिविधि कमजोर पड़ रही है। यही वजह मानी जा रही है कि कर्णेश्वर मेला महोत्सव की रौनक साल-दर-साल घटती नजर आ रही है।

आदिवासी क्षेत्र में महंगे टिकट—कितना जायज़?

स्थानीय लोगों का कहना है कि आदिवासी बहुल इलाके में इस तरह की ऊंची टिकट दरें परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालती हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सांस्कृतिक मेले का उद्देश्य मनोरंजन और परंपरा का संरक्षण है या फिर मुनाफाखोरी?

इस बार प्रशासन के सामने बड़े सवाल

क्या सुरक्षा और बीमा को लेकर सख्ती दिखाई जाएगी?
टिकट दरों पर नियंत्रण होगा या फिर मनमानी जारी रहेगी?
क्या पारंपरिक दुकानदारों और क्राफ्ट बाज़ार के बीच संतुलन बनाया जाएगा?

क्या आयोजन की पारदर्शिता सुनिश्चित की जाएगी?

आस्था का मेला, भरोसे की कसौटी
कर्णेश्वर मेला केवल उत्सव नहीं, बल्कि क्षेत्र की पहचान और आस्था का प्रतीक है। ऐसे में ज़रूरी है कि प्रशासन और आयोजक पारदर्शिता, सुरक्षा और जवाबदेही को प्राथमिकता दें, ताकि मेले की रौनक लोगों की खुशियों से जुड़ी रहे—न कि विवादों और अव्यवस्थाओं से

मिश्रा जी की कलम से 🖊️....

Post a Comment

0 Comments